शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि भेदभाव के नाम पर क़ानून का कोई दुरुपयोग न हो, ये केन्द्र, राज्यसरकारों और यूजीसी सभी की जिम्मेदारी है।

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यानी यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह कहते हुए रोक लगा दी कि इनके प्रावधानों को पहली नज़र में देखने पर अस्पष्टता नज़र आती है

कोर्ट ने कहा कि इन नियमों के दुरुपयोग की आशंका है, इसलिए विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों की खामियों को दूर करने पर विचार कर सकती है. बीजेपी के कई नेताओं का कहना है कि सरकार कोर्ट के फ़ैसले का पालन करेगी

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा कि नए नियमों को लागू करने के बाद सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था

उन्होंने एक्स पर किए अपने पोस्ट में लिखा है, ”इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नए नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जांच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही नए नियमों पर रोक लगा दी हो पर अब भी ये मुद्दा गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन नियमों को लाने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी?

दरअसल, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन ने पिछले साल मार्च महीने में संसदीय शिक्षा समिति को विश्वविद्यालय परिसरों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों से जुड़ी जानकारी दी थी.

इसमें बताया गया था कि साल 2019-20 से लेकर 2022-23 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें लगभग 118% बढ़ी हैं

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें

इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि ‘नए नियमों को लाने के लिए सरकार ने कोई अलग से पहल नहीं की थी ।

उनका कहना है, “यह इंदिरा जयसिंह और दिशा वाडेकर (वरिष्ठ वकील) की पहल का नतीजा था. 2017 में जब रोहित वेमुला की खुदकुशी का मामला आया, उसके बाद से वेमुला एक्ट बनाने की मांग उठती रही. उसके भी पहले साल 2006-07 के दौरान एम्स में खुदकुशी से जुड़ी कुछ घटनाएं हुई थीं, जिसके बाद यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन सुखदेव थोराट को शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़े गाइडलाइन्स बनाने के निर्देश दिए गए थे

अपूर्वानंद बताते हैं कि साल 2012 में आई इस नियमावली में पहली बार शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के तथ्य को रेखांकित किया गया और बताया गया कि किन उपायों के ज़रिए इसे रोका जा सकता है.

लेकिन यह नियमावली प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाई. यही कारण था कि रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मां ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाख़िल की और फिर ये नए नियम लाए गए.

रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे, जिन्होंने साल 2016 में यूनिवर्सिटी कैंपस में कथित जाति आधारित भेदभाव के कारण खुदकुशी कर ली थी ।

वहीं पायल तड़वी पुणे के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा थीं, जिनकी 2019 में इसी तरह के भेदभाव के कारण मौत हुई थी ।

सरकार की मंशा या पहल!

अब तक शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी वर्ग के लोगों को शामिल नहीं किया गया था. लेकिन संसदीय समिति ने यूजीसी से इसमें ओबीसी वर्ग के छात्रों को भी शामिल करने का निर्देश दिया था. इसके बाद नए नियमों में जो जातिगत भेदभाव की परिभाषा तय की गई, उसमें ओबीसी वर्ग को भी शामिल किया गया ।

इस पर नीरजा चौधरी कहती हैं, ”हमारी राजनीति ओबीसीकरण की तरफ़ बढ़ रही है । ओबीसी तबका काफ़ी मज़बूत हुआ है और यह बीजेपी की पहचान से जुड़ी राजनीति का बड़ा हिस्सा है. इसलिए ओबीसी वर्ग को इसमें शामिल कर के बीजेपी अपने कुछ राजनीतिक हितों को साधना चाहती थी । ”

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर जनरल कैटेगरी के छात्रों की नाराज़गी बढ़ती, तो इस नई स्थिति को संभालना बीजेपी के लिए चुनौती बन जाता ।

वह कहती हैं, ”बीजेपी के अंदर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि पार्टी बहुत अधिक आइडेंटिटी पॉलिटिक्स कर रही है, जिससे सामान्य वर्ग के लोग नज़रअंदाज़ हो रहे हैं ।”

अब यूजीसी के जिन नियमों पर यह पूरा विवाद शुरू हुआ है, उन्हें समझते हैं. इसके लिए सबसे पहले यूजीसी की भूमिका को संक्षेप में जानते हैं ।

यूजीसी के चौदह पन्नों वाले नोटिफ़िकेशन के पेज नंबर दो पर इसे लाने के पीछे का उद्देश्य बताया गया था.

उसमें लिखा है, ”उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान या विकलांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग, विकलांगों के साथ भेदभाव को ख़त्म करना ।”

इसी के नीचे जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा भी दी गई थी, जिसमें लिखा है, ”जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है ।”

आपत्ति दर्ज कराने वाले लोगों का कहना था कि इन नियमों का इस्तेमाल सामान्य वर्ग के स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ किया जा सकता है और उन पर फ़र्ज़ी आरोप लगाए जा सकते हैं. वहीं आपत्ति जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर भी थी ।

हालांकि प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि शिक्षण संस्थानों में अक्सर आरक्षण से पहुंचे छात्रों के साथ ही भेदभाव देखने को मिलता है, इसलिए ज़ाहिर है कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा में आरक्षित वर्ग के छात्रों को ही शामिल किया जाएगा ।

वह कहते हैं, ”आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के छात्रों को भी तो इसमें शामिल किया गया था, लेकिन विरोध करने वाले इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे थे ।”

यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने भी एक निजी समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि नए नियम विभाजनात्मक नहीं हैं ।

इसके बावजूद विरोध जारी रहा ।

विरोध की एक और वजह ‘समान अवसर केंद्र’ था ।

दरअसल, इसी नोटिफ़िकेशन के पेज नंबर चार पर यूनिवर्सिटीज़ में समान अवसर केंद्र स्थापित करने की बात कही गई थी. इसका काम यह देखना था कि वंचित समूहों के लिए नीतियां और कार्यक्रम प्रभावी रूप से लागू हो रहे हैं या नहीं ।

इसी समान अवसर केंद्र के तहत एक समता समिति बनाने का भी प्रावधान था, जो भेदभाव की शिकायतों की जांच करती ।

इस समिति में ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात कही गई थी ।

ऐसे में विरोध करने वालों ने सवाल उठाया कि इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है. उनके मुताबिक़ निष्पक्ष जांच के लिए समिति में सामान्य वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व भी ज़रूरी है ।

नियम नहीं माने तो क्या होगा?

यूजीसी के पास अब सख्त सजा देने की ताकत है। नियम न मानने वाले संस्थानों को यूजीसी की स्कीमों से बाहर किया जा सकता है। डिग्री या ऑनलाइन कोर्स चलाने से रोका जा सकता है। सबसे बुरी सजा तो यह है कि यूजीसी द्वारा दी गई मान्यता खत्म होगी, यानी संस्थान की डिग्री बेकार हो जाएगी। एक राष्ट्रीय स्तर की मॉनिटरिंग कमेटी भी बनेगी, जिसमें अलग-अलग काउंसिल और समाज के लोग होंगे। ये साल में दो बार कामकाज की समीक्षा करेगी।

फ़िल्हाल सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का राजनीतिक दलों के नेताओं ने स्वागत किया है ।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नए नियमों पर रोक के बाद कई छेत्रीय संगठन और राजनितिक दाल इस UGC बिल के समर्थन में  आंदोलन के लिए सड़कों पर आ गए हैं।

नए नियम में क्या-क्या हैं?

  •  क्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना जरूरी है। ये सेंटर गरीब और पिछड़े छात्रों की मदद करेगा।
  • इक्विटी कमेटी बनेगी, जिसके अध्यक्ष संस्थान के प्रमुख होंगे। कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाएं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व होगा। कमेटी साल में कम से कम दो बार मिलेगी।
  • हर 6 महीने में रिपोर्ट जारी होगी, जिसमें कैंपस में छात्रों की जाति-आधारित संख्या, ड्रॉपआउट रेट, शिकायतें और उनका स्टेटस बताया जाएगा।
  • 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन होगी।
  • ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और ‘इक्विटी एम्बेसडर’ बनेंगे, जो हॉस्टल, विभागों में नज़र रखेंगे।
  • शिकायत आने पर 24 घंटे में कमेटी की बैठक होगी। तय समय में कार्रवाई होनी होगी। अगर संतुष्ट न हों तो अपील ओम्बड्सपर्सन के पास जा सकती है।
  • भेदभाव की परिभाषा बढ़ाई गई है– जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता, जन्म स्थान आदि के आधार पर कोई भी अन्याय या अपमान होने पर शीघ्र कार्रवाई  होगी ।

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