दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ (ईयू) और भारत ने मुक्त व्यापार समझौता करने की घोषणा की है ।

भारत और यूरोपीय संघ ने मुक्त व्यापार समझौता (फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी एफ़टीए) करने की दिशा में साल 2007 में पहली बार क़दम बढ़ाए थे. अब लगभग 19 साल बाद यूरोपीय संघ और भारत मुक्त व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं ।

विश्लेषक मान रहे हैं कि इस समझौते की सबसे बड़ी वजह मौजूदा वैश्विक राजनीति है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कारोबार का इस्तेमाल अन्य देशों पर दवाब बनाने के लिए एक कूटनीतिक हथियार की तरह कर रहे हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक़, अमेरिका की इसी आक्रमकता का जवाब देने के लिए यूरोपीय संघ और भारत तेज़ी से मुक्त व्यापार समझौते की तरफ़ बढ़े हैं।

इस समझौते को लेकर दोनों पक्षों में सैद्धांतिक सहमति बन गई है लेकिन इसके प्रभावी होने में अभी लंबा वक़्त लग सकता है क्योंकि इसे क़ानूनी रूप देने के लिए यूरोपीय संघ की पार्लियामेंट और यूरोपीय परिषद में पारित करवाना है।

विश्लेषकों के मुताबिक़, भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन और भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं का भी संकेत देता है।

यह डील ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा हुआ है और अमेरिका भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ़ लागू कर चुका है।

ये सवाल भी उठ रहा है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस समझौते पर अमेरिका कैसी प्रतिक्रिया देगा और क्या अमेरिका कारोबार और टैरिफ़ को लेकर और अधिक आक्रामक होगा।

माना जा रहा है कि यह समझौता अमेरिका को आर्थिक से ज़्यादा राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर असहज कर सकता है।

यह समझौता सिर्फ़ कारोबार तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक राजनीति पर भी होंगे, ख़ासकर अमेरिकी की आक्रामक कारोबार नीति पर।

ट्रेड इकोनॉमिस्ट बिस्वजीत धर के अनुसार, अमेरिका लंबे समय से भारत जैसे बड़े बाज़ार के साथ एक बड़ी ट्रेड डील करना चाहता था, ताकि वह भारतीय बाजार से अधिकतम लाभ उठा सके. उनके मुताबिक, भारत और ईयू (EU) के बीच हुई यह डील अमेरिका के लिए एक रणनीतिक झटका है, क्योंकि इससे अमेरिका-भारत ट्रेड एग्रीमेंट की संभावनाएं कमज़ोर होती दिख रही हैं।

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार के अनुसार, अमेरिका ने भारत और यूरोपीय संघ, दोनों के सामने कड़े और असंतुलित ट्रेड टर्म्स रखने की कोशिश की, जिससे दोनों को यह संकेत देने की ज़रूरत पड़ी कि उनके पास अमेरिका के अलावा भी विकल्प हैं।

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “इस समझौते को बहुत तेज़ी से अंजाम तक पहुंचाया गया. इसके पीछे एक बड़ा मक़सद यह था कि अमेरिका पर दबाव बनाया जा सके और बेहतर शर्तों के लिए बातचीत की गुंजाइश बनाई जा सके।”

वहीं, थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े प्रोफ़ेसर हर्ष वी. पंत का कहना है कि अमेरिका अब ट्रेड को खुले तौर पर एक राजनीतिक और भू-रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

प्रोफ़ेसर पंत के मुताबिक़, “ट्रंप प्रशासन ट्रेड वार्ताओं को दबाव बनाने के औज़ार के रूप में देखता रहा है। अगर अमेरिका भारत-ईयू के बीच हुए इस समझौते को लेकर अहसज महसूस करता है तो भारत–अमेरिका ट्रेड डील में और देरी देखने को मिल सकती है।”

आर्थिक मामलों के जानकार और जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर विश्वजीत धर कहते हैं कि, भारत और ईयू (EU) के बीच एफ़टीए (FTA) की घोषणा अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि वह चाहता था कि भारत जैसे बड़े बाज़ार के साथ जल्द से जल्द ट्रेड डील करे और इस मार्केट से अधिकतम फायदा उठाए. लेकिन अब जब भारत ने यूरोपीय संघ के साथ बड़ी डील कर ली है, तो अमेरिका के साथ ट्रेड डील की संभावनाएं दिन-ब-दिन कमज़ोर होती जा रही हैं. इसलिए अमेरिका की तरफ़ से एक नकारात्मक प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है।”

प्रोफ़ेसर  धर का मानना है कि अमेरिका भारत और ईयू दोनों पर नए टैरिफ़ लगाने की धमकी दे सकता है, क्योंकि ट्रेड को वह एक दबाव के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *